साढ़े तेरह चुस्कियां
KAHAANI
Vidha
5/8/20241 min read
मैंने गुस्से से कहा, ‘रमन तुमने मेरी किताब फिर छुपा दी।’
रमन मेरी तरफ देखता रहा और बोला, ‘नहीं तो!’
‘तुम्हारी आँखों में ये जो बेईमानी है ना मुझे अच्छे से दिख रही है।’
‘नहीं राधा मैं सच कह रहा हूँ।’
‘तो फिर कल तुमने ये क्यूँ कहा कि मेरी किताबें तुम्हें दुश्मन सी लगती हैं और मेरी कविताएँ उतनी दमदार नहीं हैं।’
'राधा! तुम्हारी किताबों से मैं खो जाता हूँ... हार जाता हूँ! क्यूंकि जब तुम पढ़ रही होती हो तो तुम मुझसे लड़ती नहीं हो। तुम्हारी आँखों का काजल तब हल्का लगता है और तुम्हारे माथे पर अभी ये जो भँवर बना हुआ है... ये ठहरे हुए तालाब सा लगता है... तुम्हारे गालों के निचले हिस्से में अभी जो ये कसाकसी दिख रही है ये भी नहीं दिखती। तुम्हारी किताबें मुझे कई दफ़ा तब दुश्मन सी लगती हैं जब तुम्हारी नज़रें उनसे ऊपर नहीं उठती। और हाँ मैंने कहा था कि तुम्हारी कविताएँ उतनी दमदार नहीं हैं क्यूंकि कविता...उसे कहने वाले के लिए बहुत बड़ी चीज़ होती है लेकिन अगर आपको कविता पसंद आ जाये तो ये ज़रूर देखना कि बात कविता से कहीं ज़्यादा कविता कहने वाले में होती है। इसीलिए मुझे तुम पसंद हो।,’
‘राधा, मुझे किताबें समझ नहीं आतीं। तो जब तुम पढ़ रही होती हो तब हर बार मैं तुम्हारी किताब के कोने से तुम्हें पढ़ रहा होता हूँ। और समय का पता ना तुम्हें चलता है और ना मुझे। तुम उसे किताब वाला सुकून कहती हूँ और मैं उसे ज़िंदगी वाला सुकून!'
मैंने खीजकर कहा, ‘हां! अब तक मैं करीबन 5 किताबें लिख चुकी हूँ। कहानियां पढ़ी भी हैं और लिखी भी। जो तुम कर रहे हों वो मुझे सब पता है। मेरे सामने शब्दों का ये खेल ना ही खेलो।’
मैं कमरे से बाहर चली गई। मैंने उसकी हर बात बड़े गौर से सुनी थी। रमन वो आदमी था जो मेरी हर कहानी की सभी लड़कियों के सपनों के राजकुमार जैसा था। ज़िंदगी में जिन छोटी छोटी बातों को हम सिरे से नकार देते हैं वो अक्सर यादें बनकर चुभती भी हैं और सुकून भी देती हैं।
***
उस दिन कमरे से निकलने के बाद रमन ने क्या सोचा क्या किया उसके सिर्फ कयास ही लगा पाती हूँ। पर आज ये कह सकती हूँ कि शब्दों का गुमान कई बार रुपयों के गुमान से ज्यादा खतरनाक होता है। उस दिन जब मैं कमरे से निकली तब रमन मेरा प्यार था अब जब हर बार कमरे में जाती हूँ तो मैं अपने पति को पाती हूँ।
वो अब घुमा फिराकर कुछ नहीं कहता। मेरी किताबें हमेशा अपनी जगह पर होती हैं। रोज़ सुबह की चाय वही बनाता है। हम साथ में_ अपने घर की छत पर बैठकर चाय पीते हैं।
करीबन हर 10 सेकंड में वो अपने कप को टेबल पर रखने और उठाने का काम कर हुआ उस प्याले से करीबन साढ़े तेरह चुस्कियों में और तकरीबन 2 मिनट में अपनी चाय खत्म करता है।
चाय पीते हुए एकटक आसमान को निहारता रहता है। जैसे मेरा एकाउंटेंट पति आज सभी फाइनेंस शीट्स को आसमान के कंप्यूटर में सेव करेगा।
आसमान का कंप्यूटर! ये शब्द थोड़े अजीब हैं लेकिन रमन की जिन बातों पर मैं फिदा हुई थी उनमे से एक था उस वो आसमान का कंप्यूटर।
रमन कहता था कि ‘तुम कवि लोग आसमान के कैनवस की बात कर सकते हो तो हम एकाउंटेंट लोग आसमान के कंप्यूटर की बात क्यों नहीं कर सकते।’
अब रमन पहले की तरह बोलता ही नहीं है।
***
रमन को बोलना पसंद था। उसके पास हज़ारों बातें होती थीं कहने के लिए और कमाल की बात ये है कि उसके पास उन बातों को कहने के लिए शब्दों की भी कोई कमी नहीं थी।
उस बात को 6 महीने हो चुके हैं। और कुछ उतना ही समय शायद हमें ठीक से बात किए हुए हो गया है।
पिछले हफ्ते मेरे जन्मदिन से पिछली रात लिविंग रूम में एक बड़ा सा डिब्बा रखा था। उसमें से एक विंटेज टाइपराइटर निकला जिसके बारे में मैंने हमारी विशबूक में लिखा था।
जिस समय मैं टाइपराइटर पर से प्लास्टिक शीट हटा रही थी, रमन मेरे पास से गुजरा। चुप चाप एक कैंची रखकर थोड़ा दूर जाकर खड़ा हुआ और बोला, ‘हैप्पी बर्थडे राधा‘ और फिर एकाएक कमरे में चला गया।
ये वो आखिरी बात थी जो उसने मुझसे सीधे तौर पर कही थी। उसने कुछ कहा ये मेरे लिए बड़ी बात है।
कई बार सोचती हूँ कि जिस बन्दे को किताबें पसंद ही नहीं थीं उसके पास इतने शब्दों का ख़ज़ाना कैसे होता था।
शायद हमारे साथ में होने की वजह भी यही थी कि रमन को बोलना बहुत पसंद था और मैं सुनने में माहिर थीं। मैं मानती थी कि कहानियां लिखने के लिए कहानियां पढ़ना ही नहीं सुनना भी बहुत ज़रूरी है।
उसकी माँ कहती थीं किया लड़का इतना बोलता है तुम इसे कैसे झेल लेती हो। वो किनारे बैठकर मुस्कुराता रहता था। और मैं कहती थी कि माँ अपने किए गुनाह खुद ही भुगतने पड़ते हैं। इस बात पर रमन तेज ठहाका लगा देता था।
माँ कहती — बेटा बात तो सही है तेरी और फिर हंस पड़तीं।
अब सोचती हूँ कि सच में अपने किए गुनाह खुद ही भुगतने पड़ते हैं। रमन मुझे भुगत ही तो रहा है। उसके कहे कुछ शब्द मेरे मन को_ रेगिस्तान के सूखे रेत पर पानी की बौछार जैसे लगते हैं।
***
उस रात टाइपराइटर से मैंने जो पहले शब्द लिखे, वो थे, ‘I FEEL SORRY!’ और फिर मैं सोने चली गई। अगली सुबह जब जागी तो टाइपराइटर अब मेरी स्टडी टेबल के साइड में रखी एक टेबल पर रखा था, उसपर कवर चढ़ा हुआ था।
रमन को बेतरतीबी कभी पसंद नहीं रही। और हमारे घर में ज्यादातर, वे ही चीज़ों को संभालकर सलीखे से रखता है। कुछ घंटों में उसी पुरानी भयावह चुप्पी और सुबह की चाय और नाश्ते के बाद रमन अपने ऑफिस के लिए रवाना हो गया।
मैंने टाइपराइटर से कवर हटाकर कुछ लिखना चाहा, तो देखा तो कागज़ पर एक नयी लाइन लिखी थी।
‘Its Okay. It’s your birthday. Always stay Happy.’
इतने कम शब्द उस रमन के नहीं हो सकते जो मेरे जन्मदिन के लिए उतावला रहा करता था। उसके पास इस दिन के लिए इतने प्लैन्स होते थे कि मुझे सोचने में खीज होती थी। उसकी ज़िंदादिली में दिन कैसे निकल जाता था पता ही नहीं चलता था।
रमा कई बार कहानियां भी सुनाता था। जब उसकी कहानी रिपीट होने लगीं तब मैं नयी कहानियों के लिए नयी किताबें देखने लगी। एक किताब... तीन किताब... फिर और किताबें।
सच ही तो कहा था उसने! मेरी किताबें कितनी बार उसे दुश्मन सी लगी होंगी। हर रोज उसके सामने मुँह बाए बेशर्मी से उसकी मोहब्बत को उससे छीन लेती होंगी।
कितना लुटा हुआ महसूस करता होगा मेरा... रमन।
मैंने उस कागज़ पर एक लाइन और जोड़ दी।
‘How to be? I miss you.’
ये लिखते समय मेरी आँखों से एक बूँद झरकर कागज़ पर लिखे Happy शब्द पर गिर गयी। शब्द धुला नहीं, पर कुछ देर में कागज़ का वो हिस्सा सख़्त सा हो गया। मैंने फिर से टाइपराइटर को ढँक दिया।
ज़िन्दगी में ज़्यादातर बार हमारी आत्मा हमको चेताती है कि हम कहाँ गलत जा रहे हैं वैसे ही जैसे कि हमारे किशोरावस्था में हमारी माँ हमें समझाती थी। और हम खीझकर माँ से लड़ जाते थे। माँ अपनी बात मनवा लेती थी, आत्मा माँ की तरह ज़बरदस्ती सही रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं करती बल्कि पिता की तरह साइकल को बैलेंस करने की कला सीखाकर हमें ज़िन्दगी की रोड पर छोड़ देती है।
जब बैलेंस कहीं छूट जाता है और हम गिर जाते हैं तो पीछे मुड़कर पिता को ढूंढते हैं। और वो दूर खड़े मुस्कुराते हुए इशारा करते हैं कि उठो, और फिर कोशिश करो। पिता को भरोसा होता है कि इस बार हम गिरेंगे नहीं।
रमन की चुप्पी माँ की ज़बरदस्ती सी लगती है और उसके पुराने वाले रूप की यादें पिताजी द्वारा इशारों में दिया गया वो ढाढस है कि उठो, और फिर कोशिश करो।
इतने महीनों में मैं खुद को माफ़ नहीं कर पायी हूँ। क्यूंकि इतना पढ़कर और इतना लिखकर अगर मैं प्यार को नहीं संभाल पायी तो मैंने सब जाया कर दिया है। मुझे नहीं पता कि अपने शब्दों के गुमान में या कहूं कि अपने शहूर में मैंने रमन को जो ठेस पहुंचाई है, उसके लिए वो मुझे माफ़ कर भी पायेगा या या नहीं।
मुझे उस दूसरे मौके का इंतज़ार है जब एक सुबह रमन अपनी चाय को 2 मिनट की जगह 5 मिनट में ख़त्म करेगा और बोलेगा, ‘तुम्हारी आँखों का गहराया काजल मेरी सुबह की जल्दी में शाम का सुकून भर देता है।’
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