नए से हम तुम, नए से सब मिलेंगे।
Yamini
ख़्वाबों में सुलझनें होंगी...
होंगे कुछ कायदे नए।
कुछ वाकिये नए होंगे…
कुछ हम होंगे नए।
उसी पुरानी_ अदरकी चाय की प्याली से…
नए से ख़्वाब उड़ेंगे।
उन्हीं पुरानी सरगोशियों में_ लिपटे से…
कोरे से एहसास मिलेंगे।
लोग वही, अदावतें नयीं सी…
मुस्कुराहटें वहीं, वजहें नयीं सी…
नए से हम_ तुम_ नए से_ सब मिलेंगे।
नीव पुरानी वाली, मकाँ नए से...
जड़ पुरानी वाली, फूल नए से...
शामें पुरानी वाली, दिन नए से मिलेंगे।
जैसे पतझड़ पार...
ओस सूखे पत्ते से मिलती हो।
जैसे कोई लहर थकी सी...
चुप से किसी किनारे से मिलती हो।
मिलते हों बियाबान सन्नाटे में…
जैसे किसी अपने के स्वर।
मिलते हों ठण्ड-ओ-कोहरे में…
किसी अलाव से निकले जुगनू।
जैसे किसी बच्चे की आँखों में,
जादू चमकता हो।
जैसे किसी निवाले को माँ,
कोको से_ बचा लाती हो।
जैसे देवालय में सहसा ही,
आंसूं तुम्हे_ तुमसे मिलाते हों।
जैसे कोई वजह मिल जाती हो...
बेवजह ही खोली_ किसी दराज़ में।
कुछ वैसे ही थोड़े पुराने से,
थोड़े नए, थोड़े जाने, थोड़े अनजाने से।
किसी नयी पौह में_ सराबोर होते,
जैसे क्षितिज को सूरज भीगा देता हो।
कुछ वैसे से नए होकर…
नए से हम_ तुम_ नए से_ सब मिलेंगे।
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